गुमशुदा मामलों पर हाईकोर्ट सख्त, शीर्ष अधिकारियों से मांगा जवाब
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की बढ़ती संख्या और उनकी तलाश में हो रही देरी को लेकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए राज्य के अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई के दौरान दोनों वरिष्ठ अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होंगे। उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि गुमशुदा व्यक्तियों की तलाश के लिए प्रदेश में क्या ठोस व्यवस्था मौजूद है और बीते दो वर्षों में बड़ी संख्या में लोगों का पता न चल पाने के पीछे क्या कारण रहे। यदि कोई तयशुदा प्रक्रिया नहीं है, तो तत्काल मानक कार्यप्रणाली (SOP) तैयार करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने चिनहट निवासी विक्रमा प्रसाद की याचिका पर पारित किया। याचिका में उन्होंने अपने 32 वर्षीय बेटे के जुलाई 2024 से लापता होने के बावजूद पुलिस द्वारा प्रभावी कार्रवाई न किए जाने की शिकायत की थी।
इससे पहले अदालत के समक्ष दाखिल सरकारी आंकड़ों में बताया गया था कि जनवरी 2024 से जनवरी 2026 के बीच प्रदेश में एक लाख से अधिक गुमशुदगी के मामले दर्ज हुए, लेकिन उनमें से बहुत कम मामलों में ही सक्रिय तलाश की कार्रवाई की गई। इस स्थिति को अदालत ने गंभीर और चिंताजनक बताया।
कोर्ट ने इसे केवल एक व्यक्ति का मामला न मानते हुए व्यापक जनहित से जुड़ा विषय करार दिया और इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज करने का आदेश दिया है। अब यह मामला विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है, जहां राज्य की गुमशुदा लोगों से जुड़ी नीति और कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा की जाएगी।

















